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एक्लव्य का वध किसने किया था।

 

 एक्लव्य का वध

एक्लव्य
एक्लव्य

एक्लव्य का असली नाम अभय था। , उनके पिता एक निषाद राजा थे. ,जिनका नाम हिरन्यधनु था। और उनकी माता का नाम सुलेखा था। एक्लव्य को बचपन से धनु विधिया सिखने की लगन थी , जिसके कारण उनके गुरु ने उनका नाम एकलव्य रखा। उसके बाद उनकी शादी, उनके पिता के मित्र की बेटी के साथ हुई। जिसका नाम सुनीता था। लेकिन शस्त्र में माहिर अभय (एकलव्य) को धनूर विद्या में आगे बढ़ने की चाह थी। जिसके कारण वह गुरु द्रोणाचार्य के पास जाता है, और उनका शिष्य बनने की इच्छा बताता है। . किन्तु द्रोणाचार्य सिर्फ ब्राह्मण और क्षत्रिय जाती के लोगो को ही शिक्षा देते थे। इस कारण द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्विद्या सीखने से माना कर दिया। लेकिन एक्लव्य को धनुर्विद्या तो सिखनी ही थी। उन्होंने पास के जंगल में गुरु द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनायीं और उनको अपना गुरु मन के धनु विद्या सिखने लगा. कुछ समय के बाद एक्लव्य धनुर्विद्या में माहिर हो गया था। एक दिन जब एकलव्य धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था. तभी एक कुत्ता उनको देख के भोकने लगा। जिसके कारन एकलव्य को अभ्यास करने में बाधा आने लगी। लेकिन उनका ज्ञान इतना हो चूका था. की बिना कुत्ते को चोट पहुचाये ,ऐसे तीर चलाये , जिससे की कुत्ते का मुह बंद हो गया। और वो वह से भाग गया। लेकिन वो कुत्ता द्रोणाचार्य का पालतू ही था. उन्होंने देखा कुत्ते के मुह में ऐसे तीर चलने वला कोई अच्छा धनुर्धारी ही होगा। और उसकी खोज करते हुए , एक्लव्य के पास पहुच गए. और उससे पूछा की यह विध विद्या तुमको किसने सिखाई। तब एक्लव्य ने द्रोणाचार्य ने उनको ,उनकी ही मूर्ति दिखाते हुए कहा। मेरे गुरु तो आप ही हो,और आप ही से मैंने धनुर्विद्या सीखी है। अब मुझे आपको गुरु दक्षिणा देनी होगी। तब ही गुरु दक्षिणा में द्रोणचार्य ने ,एक्लव्य का अंघूठा मांग लिया। अब जकलव्य ने गुरु दक्षिणा में अपना अंघूठा तो दे दिया। लेकिन अब भी वो तीर चलाने में अर्जुन की तरह माहिर था। और वहा से चला गया। एक बार जब वह झ्रसंध की सेना की ओर से जब मधुरा में आक्रमण करता है. तब एक्लव्य के हाथो कई यादव सैनिक मारे जाते है। यह देख के श्री कृष्ण भगवान छल से उनका वध करते है.

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